चन्देलों के आदि पुरुष चन्द्रवर्मा थे। उनके पूर्व पुरुष मध्य भारत, बघेलखंड और बुन्देलखंड में रहते थे। उनका रहन-सहन, आचार-विचार तथा आहार-विहार वीर गुहिलौतों से मिलता-जुलता था। शंकर दिग्विजय होने के पूर्व वे शक्तिवाद के उपासक थे। बौद्धों का साम्राज्य रहने पर भी वे शक्ति की उपासना करते थे और वीर क्षात्र धर्म के अनुसार जीवन निर्वाह करते थे।
चन्देलों का सैनिक जीवन और धर्म
चन्देलों के प्राचीन पुरुष सैनिक जीवन व्यतीत करते थे। वर्णाश्रम-सत्कर्म ही उनका मुख्य धर्म था। वे शत्रुओं की वीरता की प्रशंसा करते थे, विपत्तियों से उन्हें बचाते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके लिए अपना रक्त भी बहा देने में संकोच नहीं करते थे।
वीर चन्देल अपने शरणागतों की रक्षा के लिए अपने को उत्सर्ग कर देना परम धर्म समझते थे। राजपूत राजा धर्म का पालन करते थे।
राजपूत काल की सामाजिक व्यवस्था
वे वर्णाश्रम के कट्टर पक्षपाती थे। बाल-विवाह का प्रचार नहीं था। पूर्ण ब्रह्मचर्य समाप्त होने पर ही वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। बालक जब तक वीर सैनिक न हो जाए, अपने बल से शत्रुओं के गर्व को चूर न कर दे और अपनी योग्यता का पूर्ण परिचय न दे, तब तक उसका गृहस्थाश्रम-प्रवेश अत्यन्त दुष्कर था।
ब्रह्मचर्य और वीरता
ब्रह्मचर्य की सेवा से वे बलवीर और मतिधीर होते थे। उसी के बल से उन वीरों ने पृथ्वी को वशीभूत किया था तथा लोक-लोकान्तरों, दिशाओं एवं विदिशाओं को कम्पित किया था। वही ब्रह्मचर्य की शक्ति थी जिसे सुनकर आज इस बीसवीं शताब्दी के ब्रह्मचर्य-भ्रष्ट लाखों दुराचारी नराधम असंभव मान रहे हैं।
गृहस्थाश्रम और सामाजिक स्वास्थ्य
ब्रह्मचर्य पूर्ण होने पर गृहस्थाश्रम भी बड़ा सुन्दर था। ब्रह्मचर्य-धारिणी महिलाएँ बलवान पुत्रों को जन्म देती थीं। रोग और दोष नहीं थे। आधुनिक भारत के समान बालकों एवं स्त्रियों की मृत्यु संख्या नहीं थी। लोग पराक्रमी, जितेन्द्रिय तथा दृढ़-प्रतिज्ञ होते थे।
सभी अपने वचन के धनी थे और धर्म-रक्षा के प्रेमी थे। पुरुष देवतुल्य थे और स्त्रियाँ देवियाँ थीं। उस समय की सामाजिक दशा उत्तम थी।
राजपूतों का शासन और आचरण
राजपूत राजा शासन-प्रबन्ध में कुशल थे, परन्तु आपसी फूट के कारण शासन-संगठन पूर्ण नहीं कर सके। उनका अधिकांश समय युद्धों में व्यतीत होता था। युद्ध के लिए वे सदैव तैयार रहते थे, पर युद्ध के समय किसानों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई जाती थी और प्रजा को कष्ट नहीं दिया जाता था।
विश्वासघात करना पाप समझते थे। राजपूत अपनी बात के पक्के होते थे और शत्रु के साथ भी उदारता का व्यवहार करते थे।
वीर सैनिकों का चरित्र
उन वीर सैनिकों में छल-कपट नहीं था। उनका हृदय शुद्ध और पवित्र था। वे दुराचार और दुर्व्यसनों से दूर रहते थे। पुरुष पत्नीव्रतधारी थे और स्त्रियाँ पवित्रता की प्रतीक थीं। बालक मातृ-पितृ भक्त थे और सेवक सच्चे स्वामी-भक्त होते थे।
उनकी सभ्यता उच्च कोटि की थी। वे कला-कौशल के जानकार और विविध विद्याओं के ज्ञाता थे। नवयुवक देश और धर्म के लिए उत्सर्ग होने वाले थे तथा स्त्रियाँ सती-धर्म का पालन करने वाली थीं।
सत्य, करुणा और धर्म
वीर राजपूत सत्य का पालन करते थे। वे दीन-दुखियों की सहायता के लिए सदैव कटिबद्ध रहते थे।
— भारत का इतिहास
राजपूत समाज में स्त्रियों का स्थान
राजपूत समाज में स्त्रियों का अत्यन्त आदर था। वे भी शूरवीरता में पुरुषों से कम न थीं। उनका पतिव्रत धर्म, वीरता तथा साहस भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। युद्ध के समय अपने सतीत्व की रक्षा के लिए वे अग्नि में जलकर भस्म हो जाती थीं।
— History of Rajasthan
चन्देलों के आदि पुरुष से सम्बन्धित ये सभी गुण और मूल्य उनके वंश की महानता को दर्शाते हैं। चन्देलों के आदि पुरुष ने जो परंपरा स्थापित की, वह आज भी भारतीय संस्कृति और क्षत्रिय धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके धार्मिक मूल्यों, सामाजिक व्यवस्था और वीरता की परंपरा को आज भी याद किया जाता है।

