चन्द्र के वंशधर: पराक्रमी महाबली चन्द्रवर्मा

पराक्रमी महाबली चन्द्रवर्मा ने अपनी अपूर्व वीरता प्रदर्शित की। उसकी वीरता की धाक से सारा भारत दहल उठा। चन्द्रवंश प्रवर्तक चन्द्रमा के समान ही उसने लोगों को मोहित कर लिया। समकालीन वीर गुहिलौतों (सूर्यवंशियों) ने उससे संधि कर ली। हिमालय से कुमारी तक एक बार विजय-दुन्दुभी बज उठी।


दिग्विजय और महायज्ञ

दिग्विजय के उपलक्ष्य में महाराज चन्द्रवर्मा ने एक महायज्ञ किया। बड़े-बड़े ऋत्विज ब्राह्मण एकत्र हुए और देश-देशान्तरों के राजा उपस्थित हुए। यथासमय ऋत्विजों ने चन्द्रवर्मा को दीक्षित किया।

सुन्दर, सुसज्जित यज्ञ-मण्डप में अग्नि-प्रविष्टापन कर सुगन्धित द्रव्यों की आहुति दी गई। हजारों वर्षों बाद इस महायज्ञ से दिशाएँ और विदिशाएँ सौम्य हो उठीं। महाराज चन्द्र के यज्ञ में बड़ा महोत्सव हुआ।


आर्यकाल की सामाजिक स्थिति

आर्यकाल में स्त्रियों की बड़ी उन्नति थी। सभी उत्तम गुणों से युक्त थीं। वे प्राणों से बढ़कर सतीत्व का मूल्य समझती थीं। बहुधा देखा जाता है कि उस काल की वीर बालाएँ सहस्रों की संख्या में आत्मोत्सर्ग कर चुकी थीं।
— लेखक


चन्देल राज्य की स्थापना और नगर निर्माण

इसी समय महीप चन्द्र ने महोत्सव नामक नगरी की स्थापना की। कालिंजर का सुदृढ़ दुर्ग बनवाया तथा चन्देरी का जीर्णोद्धार कराया। इस प्रकार सर्वत्र सुधार कर कालिंजर को राजधानी नियत किया।

Founder of Chandel Rajya. In the history of Bundelkhand, Chanderi is the oldest.
History of Bundelkhand


चन्द्रवर्मा का शासन और उपलब्धियाँ

चन्द्रवर्मा ने अपने शासनकाल में अनेक यज्ञ किए। प्रजा को सन्तुष्ट रखा, कला-कौशल की उन्नति की तथा विद्या का प्रचार कराया। बड़े-बड़े राजभवन बनवाए तथा धर्म-स्थानों का जीर्णोद्धार कराया। आज भी बुन्देल और बघेलखंड में उनकी कीर्तियाँ चमक रही हैं।


उत्तराधिकार और वंश परंपरा

चन्द्रवर्मा का पुत्र वीरवर्मा भी बड़ा यशस्वी राजा हुआ। उसके पुत्र ने अपनी योग्यता से आजीवन पिता के विशाल राज्य की रक्षा की। वीरवर्मा का पुत्र वज्रवर्मा हुआ। इसके शासनकाल में चन्देलों का उन्नत सूर्य रुक गया।

वर्तमान महोबा। यह हमीरपुर जिले में स्थित है। अब भी वहाँ अतीतकाल के स्मारक विद्यमान हैं।
— लेखक


चन्देल वंशावली

चन्द्रवर्मा का पुत्र वीरवर्मा,
वीरवर्मा का पुत्र वज्रवर्मा,
वज्रवर्मा का वंदनवर्मा,
वंदनवर्मा का जगवर्मा,
जगवर्मा का सत्यवर्मा,
सत्यवर्मा का सूर्यवर्मा,
सूर्यवर्मा का मदनवर्मा,
मदनवर्मा का कीर्तिवर्मा,
और कीर्तिवर्मा का पुत्र परमर्दिदेव (परमाल) हुआ।
— राय होल


चन्देल शक्ति का पुनरुत्थान

धीरे-धीरे दो-तीन पीढ़ियों तक चन्देलों की शक्ति गिरती रही। अन्ततः सूर्यवर्मा के उत्पन्न होने पर गिरता हुआ उन्नत सूर्य रुक गया। पश्चात् मदनवर्मा और कीर्तिवर्मा ने पुनः चन्देलों के डूबते हुए सूर्य को प्रकाशित किया।

महाराज चन्द्र की दसवीं पीढ़ी में परमर्दिदेव का आविर्भाव हुआ।


परमर्दिदेव (परमाल): ऐतिहासिक प्रमाण

परमर्दिदेव एक ऐतिहासिक राजा था। उसके कई ताम्रपत्र कञ्जकत्ता के म्यूज़ियम में सुरक्षित हैं।
— लेखक

परमर्दिदेव का ही नाम परमाल था। वह सन् 1065 ईस्वी में सिंहासन पर बैठा। साहिल उसका मंत्री था। वह स्वयं कान का कच्चा था।


महोबा पर अधिकार

महोबा उसकी पुरानी राजधानी नहीं थी। महोबा परिहारों के अधिकार में था। मालवन्त परिहार महोबा का शासक था, जिसे लोग वासुदेव भी कहते थे। परमाल ने वासुदेव परिहार को हटाकर महोबा पर अधिकार किया।

उसने सन् 1202 ईस्वी तक राज्य किया।
— राय भीखा

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