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प्रसंग क्रमांक 2 • 13 September 2026

चन्देलों की उत्पत्ति – चन्द्रवंश से महोबा तक की कहानी

चन्द्रवंश से चन्देल वंश की उत्पत्ति, चन्द्रवर्मा के पराक्रम, चन्देल राज्य की स्थापना और महोबा पर परमाल के अधिकार तक की कथा। जानिए उस गौरवशाली वंश की कहानी, जिसकी भूमि आगे चलकर आल्हा और ऊदल की वीरगाथा की कर्मभूमि बनी।

चन्देलों की उत्पत्ति – चन्द्रवंश से महोबा तक की कहानी
वाचन:
चन्देलों की उत्पत्ति

महावली क्षत्रियों में चन्द्रवंश बड़ा पवित्र वंश माना गया है। महापुनीत सूर्यवंश ने शुद्ध हृदय से इसकी प्रतिष्ठा की है। इस पवित्र वंश में बड़े-बड़े महावीर और महात्मा उत्पन्न हुए। एक से एक बढ़कर महर्षियों के तुल्य कठिन तपस्या करने वाले राजर्षि जन्म धारण किये तथा एक नहीं, लाखों शूर-वीर प्रकट हो अपने बल-विक्रम से वसुन्धरा को वशीभूत कर एकछत्र शासन किया।

चन्द्रमा के वंशजों ने अपनी अनन्त महिमा बढ़ाई। आगे चलकर इसी पवित्र वंश में नहुष, ययाति, सुधन्वा, भरत, सार्वभौम, महाभौम, अंधकभोज, वृष्णि, कृष्ण, भीमाजुनादि बढ़े-बढ़े वीर और मतिधीर उत्पन्न हुए। इसी कुल में उत्पन्न प्रतापी भरत के नाम से इस आर्यावर्त का नाम भारतवर्ष पड़ा। निःसन्देह जब तक सूर्य और चन्द्रमा लोक-लोकान्तरों को आलोकित करते रहेंगे, प्रतापी भरत का नाम स्वर्णाक्षरों में चमकता रहेगा तथा लोग इस पवित्र वंश की कीर्ति गाते रहेंगे।

राजा ययाति से यह वंश पाँच भागों में विभक्त हो गया। यदुवंश, पुरुवंश, भोजवंश, अनु वंश और पुरू वंश। इनमें दो वंश अधिक प्रसिद्ध हुए, यदुवंश और पुरुवंश। यदुवंश में महात्मा श्रीकृष्ण ने जन्म धारण किया और पुरुवंश में कौरव पांडवों का आविर्भाव हुआ। तीन युगों तक इस वंश ने अपूर्व गौरव बढ़ाया।

सुदूर पूर्वकाल में जब द्वापर का चतुर्थ चरण बीत चुका था, वीर भोग्या वसुन्धरा पंडुर्वी हो चुकी थी, बलवान भारत बलहीन तथा निर्वीर्य हो रहा था। चन्द्रवंश का तेज क्रमशः घटने लगा। जिस भयंकर यज्ञाग्नि से सारा विश्व महाभारत के भयंकर संग्राम में धाँय-धाँय करते हुए भस्मीभूत हो चुका था, उसे न छोड़ सका।

हजारों वर्ष बीत गये। जब नवमी शताब्दि का अन्त हो रहा था, सर्वत्र शक्ति का साम्राज्य तथा पशुबल ही सत्ता का कारण था। उस शक्ति के विशाल-साम्राज्य में जब धर्म-रक्षा के लिये कुमारिल ने अपने को उत्सर्ग कर दिया था, शंकर का दिग्विजय दिशाओं को कम्पायमान कर चुका था तथा जिस समय राजस्थान में सूर्यवंशीय वीर गुहिलौतों की विजय-ध्वजा फहरा रही थी, मध्य भारत में चन्देलों का प्रादुर्भाव हुआ।

चन्देल राजपूत नवमी शताब्दि में बड़े शक्तिमान थे। इनका राज्य उस देश में था जिसे आजकल बुन्देलखंड कहते हैं। चन्देरी इनकी राजधानी थी। राजा धंग के समय चन्देल राज्य का विस्तार अधिक हो गया। उसने कन्नौज के परिहार राजा को लड़ाई में हराया और उत्तर में यमुना नदी तक अपना राज्य बढ़ा लिया।

धंग का बेटा गंड भी बड़ा प्रतापी था। जब कन्नौज के राजा राज्यपाल ने 1018 ई. में महमूद गजनवी की अधीनता स्वीकार की, तब गंड ने अन्य राजपूतों को भड़काया। सब ने मिलकर राज्यपाल पर चढ़ाई की और उसे मार डाला। इसी वंश में राजा परमाल हुआ।

चन्देलों के आदि पुरुष चन्द्रवंशी महीप चन्द्रवर्मा था। इतिहासकारों ने चन्द्रवर्मा के वंशजों को चन्देल क्षत्रिय कहा है। महीप चन्द्र वीर और साहसी योद्धा था। उसने अपने बाहुबल से बुन्देलखंड के अनेक राजाओं पर विजय प्राप्त कर चन्देल राज्य स्थापित किया। भारत के कोने-कोने में उसकी वीरता की धाक जम गई। बड़े-बड़े शूर सामन्त उसकी वीरता पर मुग्ध हो अनुचर बन गये और उसकी आज्ञा पर प्राणोत्सर्ग करने के लिये कटिबद्ध रहने लगे।

चन्द्रवर्मा प्रजा-पालक नरेश था। उसने प्रजा की रक्षा के लिये अनेक यज्ञ किये, स्थान-स्थान पर धर्मशालायें बनवाईं तथा सहस्रों सदाव्रत खोले। आक्रमणकारियों से रक्षा के लिये कालिंजर का सुदृढ़ दुर्ग बनवाया और सर्वत्र वीर सैनिकों का प्रबन्ध किया।

प्राचीन पुरुष चन्देलों के आदि पुरुष चन्द्रवर्मा थे। उनके पूर्व पुरुष मध्यभारत, बघेलखंड और बुन्देलखंड में रहते थे। उनका रहन-सहन, आचार-विचार तथा आहार-विहार वीर गुहिलौतों से मिलता-जुलता था। शंकर दिग्विजय होने के पूर्व वे शक्तिवाद के पुजारी थे। बौद्धों का साम्राज्य रहने पर भी शक्ति की उपासना करते और वीर क्षात्र-धर्म के अनुसार जीवन निर्वाह करते थे।

चन्देलों के प्राचीन पुरुष सैनिक जीवन व्यतीत करते थे। वर्णाश्रम-सत्कर्म ही उनका मुख्य धर्म था। वे शत्रुओं की वीरता की प्रशंसा करते थे, विपत्तियों से उन्हें बचाते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके लिये अपना रक्त भी बहा देने में संकोच नहीं करते थे। वीर चन्देल अपने शरणागतों की रक्षा के लिये अपने को उत्सर्ग कर देना परम धर्म समझते थे। राजपूत राजा धर्म का पालन करते थे।

वे वर्णाश्रम के कट्टर पक्षपाती थे, बालविवाह का प्रचार नहीं था। पूर्ण ब्रह्मचर्य समाप्त होने पर वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। बालक जब तक वीर सैनिक न हो जाय, अपने बल से शत्रुओं के गर्व को चूर न कर दे, अपनी योग्यता का पूर्ण परिचय न दे दे, तब तक उसका गृहस्थाश्रम-प्रवेश अत्यन्त दुष्कर था।

ब्रह्मचर्य की सेवा से वे बलवीर और मतिधीर होते थे। उसी के बल से उन वीरों ने पृथ्वी को वशीभूत किया था तथा लोक-लोकान्तरों, दिशाओं एवं विदिशाओं को कम्पित किया था। वही ब्रह्मचर्य की शक्ति थी, जिसे सुनकर आज इस बीसवीं शताब्दि के ब्रह्मचर्य-भ्रष्ट लाखों दुराचारी नराधम असम्भव मान रहे हैं।

ब्रह्मचर्य पूर्ण होने पर गृहस्थाश्रम भी बड़ा सुन्दर था। ब्रह्मचर्य-धारिणी बालायें बलवान पुत्रों को प्रसव करती थीं। रोग और दोष नहीं थे। आधुनिक भारत के समान बालकों एवं स्त्रियों की मृत्यु संख्या नहीं थी। लोग पराक्रमी, जितेन्द्रिय तथा दृढ़-प्रतिज्ञ होते थे। सभी अपने वचन के धनी थे और धर्म-रक्षा के प्रेमी थे। पुरुष देव तुल्य थे और स्त्रियाँ देवियाँ थीं। उस समय की सामाजिक दशा अच्छी थी।

उन वीर सैनिकों में छल-कपट नहीं था। उनका हृदय शुद्ध और पवित्र था। वे दुराचार और दुर्व्यसनों से दूर थे। पुरुष पत्नीज्रतधारी थे और स्त्रियाँ पतिव्रता थीं। बालक मातृ-पितृ भक्त तथा सेवक सच्चे स्वामि-भक्त थे। उनकी सम्पत्ति उच्च कोटि की थी। वे कला-कौशलों के जानकार तथा प्रत्येक विद्याओं के ज्ञाता थे। नवयुवक देश और धर्म के लिये उत्सर्ग होने वाले तथा देवियाँ सती धर्म पालन करने वाली थीं।

उस समय किसानों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई जाती थी और प्रजा को कष्ट नहीं दिया जाता था। विश्वासघात करना पाप समझते थे। राजपूत अपनी बात के पक्के होते थे। शत्रु के साथ भी उदारता का बर्ताव रखते थे।

वीर राजपूत सत्य का पालन करते थे। वे दीन-दुखियों की सहायता के लिये सदैव कटिबद्ध रहते थे। राजपूत समाज में स्त्रियों का आदर था। वे भी शूर वीरता में पुरुषों से कम न थीं। उनका पतिव्रत धर्म, वीरता तथा साहस भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। लड़ाई के समय अपने सतीत्व की रक्षा के लिये अग्नि में जलकर भस्म हो जाती थीं।

चन्द्र के वंशधर

पराक्रमी महाबली चन्द्र ने अपनी अपूर्व वीरता दिखलाई। इसके वीरता की धाक से सारा भारत दहल उठा। चन्द्रवंश प्रवर्तक चन्द्रमा के समान इसने लोगों को मोहित कर लिया। समकालीन वीर गुहिलोतों, सूर्यवंशियों ने सन्धि कर ली। हिमालय से कुमारी तक एक बार विजय-दुन्दुभी बज उठी।

दिग्विजय के उपलक्ष में महाराज चन्द्रवर्मा ने एक महायज्ञ किया। बड़े-बड़े ऋत्विज ब्राह्मण एकत्र हुए और देश-देशान्तरों के राजे आये। यथासमय ऋत्विजों ने चन्द्रवर्मा को दीक्षित किया। सुन्दर सज्जित यज्ञ-मंडप में अग्नि प्रतिष्ठापित कर सुगन्धित द्रव्यों की आहुति दी गई। हजारों वर्ष बाद पुनः इस महायज्ञ से दिशायें और विदिशायें सौम्य हो उठीं। महाराज चन्द्र के यज्ञ में बड़ा महोत्सव हुआ।

इसी समय महीप चन्द्र ने महोत्सव नामक नगरी की स्थापना की। कालिंजर का सुदृढ़ दुर्ग बनवाया तथा चन्देरी का जीर्णोद्धार करवाया। इस प्रकार सर्वत्र सुधार कर कालिंजर को राजधानी नियत किया।

चन्द्रवर्मा ने अपने शासन काल में अनेक यज्ञ किये। प्रजा को सन्तुष्ट रखा, कला-कौशलों की उन्नति की तथा विद्या का प्रचार कराया। बड़े-बड़े राजभवन बनवाये तथा धर्मस्थानों का जीर्णोद्धार कराया। आज भी बुन्देल और बघेलखंड में उनकी कीर्तियाँ चमक रही हैं।

चन्द्रवर्मा का पुत्र वीरवर्मा भी बड़ा ही यशस्वी राजा हुआ। वीर पुत्र ने अपनी योग्यता से यावज्जीवन पिता के विशाल राज्य की रक्षा की। वीरवर्मा का पुत्र वज्रवर्मा हुआ। इसके शासन काल में चन्देलों का उन्नत-सूर्य रुक गया।

धीरे-धीरे तीन पीढ़ी तक गिरता ही रहा। अन्त में सूर्यवंश से उत्पन्न होने पर गिरता हुआ उन्नत सूर्य रुक गया। पश्चात् मदनवर्मा और कीर्तिवर्मा ने पुनः चन्देलों के डूबते हुए सूर्य को प्रकाशित किया। महाराज चन्द्र की दसवीं पीढ़ी में परमर्दिदेव का आविर्भाव हुआ।

परमर्दिदेव ऐतिहासिक राजा था। उसके कई ताम्रपत्र कलकत्ते के म्यूजियम में रखे हुए हैं।

परमर्दिदेव परमाल का नाम था। वह सन् 1064 ई. में सिंहासन पर बैठा। माहिल उसका मंत्री था। वह स्वयं कान का कच्चा था। महोबा उसकी पुरानी राजधानी नहीं थी। महोबा परिहारों के अधिकार में था। मालवंत परिहार महोबा का शासक था, उसे लोग वासुदेव भी कहते थे। परमाल ने वासुदेव परिहार को हटाकर महोबा पर कब्जा किया था। उसने सन् 1203 तक राज्य किया।
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