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प्रसंग क्रमांक 3 • 17 September 2026

दस्सराज और बच्छराज की कहानी

आल्हा और ऊदल के पिता दस्सराज और चाचा बच्छराज के जन्म की प्रामाणिक कथा। जानिए कैसे गुरु गोरखनाथ के शिष्यों सल्ल-वल्ल ने पूर्वजन्म के संकल्प, भगवान शिव-पार्वती के वरदान और राजा परिमाल के सहयोग से महोबा में वीर बनाफर वंश की नींव रखी।

दस्सराज और बच्छराज की कहानी
वाचन:
दस्सराज-बच्छराज

महाराज चन्द्रब्रह्म के मन्त्री तोमरवंशी क्षत्रिय चिन्तामणि थे। इन्होंने एक बार तपस्या करते हुए शिवजी के चरणों में शिर काटकर अर्पण कर दिया था। शिवजी ने प्रसन्न होकर वरदान माँगने की आज्ञा दी। चिन्तामणि ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की कि हे महाराज, हमारे वंश में महान् शूर-वीर उत्पन्न होकर चन्देल राज्य ही को दृढ़ करते हुये यश प्राप्त करें। शिवजी यही आशीर्वाद देकर अन्तर्धान हो गये। इन्हीं चिन्तामणि के पुत्र शशिपाल, शशिपाल के कृपाचन्द, कृपाचन्द के मकरन्द, मकरन्द के अकूर, अकूर के टोडर, टोडर के रहिमल, रहिमल के सोरठ और सोरठ के दो पुत्र सल्ल और बल्ल हुये। सल्ल और बल्ल में परस्पर अपार प्रेम था। वैराग्य उत्पन्न होने से दोनों ने वनगमन किया। वहाँ श्री गुरु गोरखनाथजी इन्हें अपना शिष्य बना कर योगविद्या की शिक्षा देने लगे।

एक दिन गुरु की आज्ञा से ये दोनों शिष्य अलग दूर जाकर समाधि का विचार कर रहे थे कि इन्हें एक सिंह का बच्चा और एक गाय का सुकुमार बछड़ा परस्पर क्रीड़ा करते हुए दिखलाई पड़े। यह मनोरम दृश्य देखकर सल्ल को सिंह का बच्चा होने और बल्ल को बछड़ा होने और फिर उसी प्रकार प्रेम-पूर्वक परस्पर क्रीड़ा करने की अभिलाषा हुई। यही चिंतन कर दोनों ने समाधि लगा ली, परन्तु फिर समाधि भंग न कर सके और तीसरे दिन उनके प्राण शरीर से निकल गये।

अन्तिम समय जो अभिलाषा थी उसी के अनुसार सल्ल ने सिंहिनी और बल्ल ने गाय के गर्भ से जन्म लिया। दोनों में अब भी अटूट प्रेम था। जब सल्ल (सिंह) शिकार को जाता तो बल्ल (बछड़ा) के गले में घंटा बाँधकर कह जाता कि जब कोई विपत्ति हो घंटा बजा देना और मैं आकर उसका निवारण कर दूंगा। पश्चात् बल्ल ने अपने मित्र की परीक्षा लेने के विचार से एक दिवस अकारण ही घंटा बजा दिया, सिंह तुरंत अपना शिकार छोड़कर आ पहुँचा। इसी प्रकार एक दिन सिंह जब शिकार कर रहा था, कुछ बधिकों ने बछड़े को जाल में फाँस लिया। सिंह ने घंटे की आवाज सुनी, परन्तु कहीं पिछले दिन ली हुई परीक्षा की ही तरह आज भी न हो, ऐसा सोच वह अपने शिकार को मारकर परन्तु जल्दी ही आ पहुँचा किन्तु उस समय तक बधिकों ने बछड़े के प्राण हर लिये थे।

सिंह ने भी मित्र के बिछोह में अपने प्राण दे दिये। जहाँ इन दोनों के शव पड़े थे हठात् उधर से शिव-पार्वती आ निकले। श्रीपार्वतीजी ने दया से द्रवित हो भगवान् शंकर से उन्हें पुनः जीवित कर देने की प्रार्थना की। महादेवजी ने पार्वतीजी के विशेष आग्रह से उन्हें मनुष्यरूप से जीवित कर आशीर्वाद दिया कि वह और उनके पुत्र महान् पराक्रमी और शूर होंगे। उन्होंने इनका नाम दस्सराज और बच्छराज रख दिया।

ये दोनों बालक वन में निर्भय घूमते थे। एक दिन महोबे के राजा परिमाल उधर से घूमते आ निकले। उसी समय दो मत्त भैंसे आपस में लड़ रहे थे जो किसी सैनिक के हटाये न हट रहे थे। अकस्मात् इन बालकों ने एक-एक को पकड़कर अलग कर दिया। राजा परिमाल इनके पराक्रम को देख अति प्रसन्न हो इन्हें अपने यहाँ ले गये। रानी मल्हना ने इन्हें बड़े प्यार से रखा और इनका दिवला और तिलका दो वीर राजकुमारियों से विवाह कर दिया। राजा परिमाल ने दस्सराज और बच्छराज को दशहरपुरवा और सिरसागढ़ रहने को दिया, परन्तु ये दोनों भाई प्रेम के कारण दशहरपुरवा में ही रहते थे। बन से आकर इस प्रकार इन्हें राज्य मिला—इसी कारण यह वंश बनाफर कहलाया।
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